सिंधु-सरस्वती सभ्यता का ४५०० साल पुराना पासा और भारत की जीवंत विरासत

Monday, Jun 01, 2026 | Last Update : 10:05 PM IST

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सिंधु-सरस्वती सभ्यता का ४५०० साल पुराना पासा और भारत की जीवंत विरासत

सिंधु-सरस्वती सभ्यता के ४,५०० साल पुराने टेराकोटा पासे की खोज और ऋग्वेद-अथर्ववेद से इसके संबंध के माध्यम से जानिए कैसे भारत आज भी एक अटूट सांस्कृतिक चेतना के रूप में जीवित है।
Jun 1, 2026, 6:00 pm ISTShould KnowJaideep Pant
सिंधु-सरस्वती सभ्यता का ४,५०० साल पुराना पासा और भारत की जीवंत विरासत
  सिंधु-सरस्वती सभ्यता का ४,५०० साल पुराना पासा और भारत की जीवंत विरासत

४,५०० साल पुराना पासा: सिंधु-सरस्वती सभ्यता की जीवित निरंतरता का जीवंत प्रमाण

इतिहास केवल खंडहरों, भूगोल या खुदाई में मिली बेजान वस्तुओं का संग्रह नहीं होता। सभ्यता की वास्तविक विरासत तो उन जीवित परंपराओं, प्रतीकों, अनुष्ठानों और अटूट सांस्कृतिक चेतना से परिभाषित होती है, जो सदियों के थपेड़ों को सहकर भी समाज के दैनिक जीवन में रची-बसी रहती हैं। इस दृष्टिकोण से देखा जाए, तो आधुनिक भारत आज भी प्राचीन 'सिंधु-सरस्वती सभ्यता' की एक निरंतर बहती आ रही जीवंत धारा है।

यह ४,५०० साल पुराना टेराकोटा पासा भारत की इसी अनवरत विरासत का एक शक्तिशाली अनुस्मारक है। द्यूत-क्रीड़ा का उल्लेख ऋग्वेद और अथर्ववेद जैसे हमारे प्राचीनतम और पवित्र वैदिक ग्रंथों में भी एक अत्यंत लोकप्रिय खेल के रूप में मिलता है। प्रतीकों, शिल्पकला से लेकर अनुष्ठानों, योगिक प्रथाओं और सामूहिक स्मृति तक, प्राचीन भारतीय सभ्यता के अनगिनत तत्व आज भी हमारे समाज के दैनिक सामाजिक और धार्मिक जीवन में पूरी जीवंतता के साथ फल-फूल रहे हैं।

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हाल ही में पुरातत्वविदों और सांस्कृतिक शोधकर्ताओं के बीच चर्चा में आया यह मिट्टी का छोटा सा पासा केवल एक ऐतिहासिक खोज नहीं है। यह भारत के प्राचीनतम ग्रंथों के पन्नों को धरातल पर हमारे सामने साक्षात जीवंत करने वाला एक अद्भुत माध्यम है।

वैदिक साहित्यों से गहरा अंतर्संबंध

पासे का खेल भारतीय समाज के मानस पटल पर कितना गहरा अंकित था, इसका सबसे बड़ा प्रमाण हमारे वेदों में सुरक्षित है। सनातन संस्कृति के दो सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र ग्रंथ—ऋग्वेद और अथर्ववेद—द्यूत-क्रीड़ा का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। ऋग्वेद के 10वें मंडल में संकलित 'अक्ष सूक्त' इस खेल के प्रति समाज के आकर्षण और इसके सामाजिक पहलुओं का मार्मिक वर्णन करता है। यह पासा इस सत्य का साक्ष्य है कि जिस खेल की चर्चा वेदों के ऋषियों ने की, उसे 4,500 वर्ष पहले सिंधु और सरस्वती नदियों के तट पर बसे महान नगरों के आम नागरिक अपने घरों में रोज़ खेला करते थे।

अद्भुत बनावट और स्वतंत्र गणितीय सोच

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे प्राचीन महानगरीय केंद्रों की खुदाई में मिले इन टेराकोटा पासों की बनावट आज के आधुनिक पासों की तरह ही छह-फलकीय (six-sided) है, जिन पर 1 से लेकर 6 तक के बिंदु (pips) बहुत ही स्पष्ट रूप से अंकित हैं। हालांकि, इनमें एक अत्यंत दिलचस्प तकनीकी अंतर देखने को मिलता है:

  • आधुनिक पासा: आज के समय में उपयोग होने वाले पासों में विपरीत दिशाओं के अंकों का योग हमेशा गणितीय रूप से '7' होता है।
  • सिंधु-सरस्वती कालीन पासा: प्राचीन काल के इन पासों पर प्रायः १ के विपरीत २, ३ के विपरीत ४ और ५ के विपरीत ६ अंकित मिलता है।

यह भिन्नता स्पष्ट रूप से प्रमाणित करती है कि उस सुदूर अतीत में भी भारतीय उपमहाद्वीप के शिल्पकारों और विचारकों ने मनोरंजन तथा यादृच्छिकता (randomization) के लिए अपनी एक पूरी तरह से स्वतंत्र, अनूठी और परिपक्व प्रणाली विकसित कर ली थी।

The 4500-Year-Old Indus Valley Terracotta DiceThe 4500-Year-Old Indus Valley Terracotta Dice

भौगोलिक अवशेषों से परे: एक जीवंत चेतना

सभ्यता का उत्तराधिकार केवल भौगोलिक सीमाओं या ईंट-पत्थरों के खंडहरों से तय नहीं होता; इसे हमारी जीवित आदतों, प्रतीकों और अनवरत सांस्कृतिक प्रवाह से जीवन मिलता है। सिंधु-सरस्वती सभ्यता के अनगिनत आयाम आज भी भारत के हर कोने में दिखाई देते हैं:

  • शिल्पकला और सामाजिक प्रतीक: मिट्टी की बनी मातृदेवी की मूर्तियां, मांग में सिंदूर भरने की पारंपरिक रीति, और मुहरों पर दिखने वाली पीपल वृक्ष की पूजा आज भी भारतीय परिवारों की दैनिक धार्मिक दिनचर्या का एक अविभाज्य अंग हैं।
  • योग और आध्यात्मिक साधना: पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त 'पशुपति मुहर' में ध्यान की विशिष्ट मुद्रा (सिद्धासन) में आसीन योगी की आकृति, भारत की प्राचीन योगिक प्रथाओं की निरंतरता का सबसे अकाट्य प्रमाण है।
  • सामूहिक स्मृति और अनुष्ठान: प्राचीन नगरों में पाई गई विस्तृत अग्नि वेदियां, पवित्र सामूहिक स्नान की अवधारणा (जैसे मोहनजोदड़ो का महास्नानघर) और प्रकृति के प्रति अगाध श्रद्धा की जो रीतियां आज से साढ़े चार हजार वर्ष पूर्व विद्यमान थीं, वे आज भी देश के पवित्र घाटों, त्योहारों और लोक-उत्सवों में पूरी गरिमा के साथ सुरक्षित हैं।

निष्कर्ष

सिंधु-सरस्वती सभ्यता का यह छोटा सा टेराकोटा पासा हमें यह अमूल्य सीख देता है कि भारत की आत्मा कभी खंडहरों में दफन नहीं हुई। युग बदले, साम्राज्य बने और मिट गए, आलीशान शहर बसे और समय के साथ विलीन हो गए, परंतु यहाँ की आंतरिक सांस्कृतिक चेतना और जीवन जीने की दृष्टि कभी नहीं बदली। भारत केवल एक भौगोलिक भूखंड नहीं है, बल्कि वह उस महान, गौरवशाली और आदिम सिंधु-सरस्वती सभ्यता की एक शाश्वत, अमर और आज भी धड़कती हुई जीवंत निरंतरता है।

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