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कौन थी मणिकर्णिका क्या है इनका इतिहास

महज 23 साल की आयु में ही अपने राज्य की कमान संभालते हुए अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे।
Feb 9, 2018, 11:27 am ISTIndiansAazad Staff
Rani laxmi Bai
  Rani laxmi Bai

19 नवंबर, 1835 को एक ऐसी शूरवीर और शक्तिशाली महिला का जन्म हुआ था जिसे आज भी लोग श्रद्धा के साथ याद व नमन करते है। इन्होने अपने जीते जी अंग्रेजों को नाकों चने चबवाए थे।महज 23 साल की उम्र में ही इन्होने अपने राज्य की कमान संभाली। हम बात कर रहे है  झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की इनका जन्म वाराणसी जिले के भदैनी में हुआ था।

रानी लक्ष्मीबाई की मां का नाम भागीरथीबाई तथा पिता का नाम मोरोपन्त तांबे था। मोरोपन्त एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। मनु जब चार वर्ष की थीं, तभी उनकी मां की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके पिता उनको अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले गए, जहां चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका प्रभावित कर दिया।


वैसे तो आप जानते होंगे कि रानी लक्ष्मी बाई का बचपन का नाम मनू था लेकिन क्या आप ये जानते है कि मणिकर्णिका के नाम से भी रानी लक्ष्मीबाई को जाना जाता है।

1842 में मनु की झांसी के महाराजा गंगाधर राव से शादी हुई. गंगाधार की पहली पत्नी की मौत हो चुकी थी. उनका कोई बच्चा भी नहीं था और उन्हें अपनी विरासत सौंपने के लिए वंशज की जरूरत थी. इस तरह मणिकर्णिका और मनु रानी लक्ष्मीबाई बन गईं. बताया जाता है कि 1851 में लक्ष्मीबाई ने एक बेटे को भी जन्म दिया. लेकिन ये बच्चा तीन महीने बाद ही चल बसा था. इसके बाद गंगाधर राव और लक्ष्मीबाई ने गंगाधर के परिवार से ही दामोदार राव को गोद ले लिया था. 1853 में महाराज गंगाधर राव की मौत के बाद।

झांसी को कमजोर होता देख 1857 में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने आक्रमण कर दिया, लेकिन रानी ने इसे विफल कर दिया। 1858 के जनवरी माह में ब्रिटेन की सेना ने झांसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया।

सबसे खतरनाक थीं रानी लक्ष्मीबाई'
इस लड़ाई को लेकर ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज ने टिप्पणी की थी, कि रानी लक्ष्मीबाई अपनी सुंदरता, चालाकी और दृढ़ता के लिए तो उल्लेखनीय थीं ही, विद्रोही नेताओं में सबसे अधिक खतरनाक भी थीं। दरअसल रानी लक्ष्मीबाई झांसी से कालपी होते हुए दूसरे विद्रोहियों के साथ ग्वालियर आ गई थीं, लेकिन कैप्टन ह्यूरोज की युद्ध योजना के चलते ही वे घिर गईं।

तात्या टोपे ने दिया था रानी लक्ष्मीबाई का साथ-

तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया। 17 जून, 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मीबाई ने वीरगति हासिल की।

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