जाने क्या है अयोध्या विवाद, कैसे हुई इसकी शुरुआत

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जाने क्या है अयोध्या विवाद, कैसे हुई इसकी शुरुआत

अयोध्या विवाद 100 साल से भी पूराना विवाद है और इस विवाद को लेकर सबसे पहले 1949 में याचिका दायर की गई थी। इसके बाद से ये विवाद बढ़ता ही चला गया।
Oct 5, 2018, 12:21 pm ISTShould KnowAazad Staff
Ayodhya dispute
  Ayodhya dispute

अयोध्या विवाद की शुरुआत सन 1853 में पहली बार हुई।  ये विवाद 1859 में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान और अधिक बढ़ गया। जब अंग्रेजों ने मुसलमानों को ढांचे के अंदर और हिंदुओं को बाहर चबूतरे पर पूजा करने की इजाजत दे दी। 

फरवरी सन 1885 में पहली बार अयोध्या मामले पर कोर्ट में मंदिर बनाने की याचिका दायर की गई जिसे महंत रघुबर दास ने फैजाबाद के उप-जज पंडित हरिकृष्ण के समक्ष रखा गया। सुनवाई के दौरान इस मामले को यह कह कर खारिज कर दिया गया कि यह चबूतरा पहले से मौजूद मस्जिद के इतना करीब है कि इस पर मंदिर बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती हालांकि ये विवाद यहां खत्म नहीं हुआ लेकिन शांत जरुर हो गया था।

अयोध्या विवाद उस समय सबसे ज्यादा बढ़ गया जब 23 दिसंबर 1949 को भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं। इसे लेकर हिंदुओं का ये कहना था कि भगवान राम प्रकट हुए हैं, जबकि मुसलमानों ने आरोप लगाया कि किसी ने रात में चुपचाप मूर्तियां रखी है।

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री जी. बी. पंत से इस मामले में फौरन कार्रवाई करने को कहा। यूपी सरकार ने मूर्तियां हटाने का आदेश दिया लेकिन जिला मैजिस्ट्रेट के. के. नायर ने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई। हालांकि नायर के बारे में माना जाता है कि वह कट्टर हिंदू थे और मूर्तियां रखवाने में उनकी पत्नी शकुंतला नायर का भी रोल था। बहरहाल, सरकार ने इसे विवादित ढांचा मानकर ताला लगवा दिया।

सन 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने एक कमिटी गठित कर यहां हिंदूओं को पूजा करने की इजाजत मांगी जिसके लिए एक बार फिर से फैजाबाद में याचिका दायर की गई जिस पर फैसाबाद के जज के. एम. पांडे ने 1 फरवरी 1986 को हिंदुओं को पूजा करने की इजाजत दे दी और यहां पर सालों से लगा हुआ ताला हटा दिया गया।  इसे देखकर मुसलमानों ने विरोध प्रदर्शन शुरु किया जिसे देखकर बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन किया गया।

06 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिरा दिया गया। इस ढांचे को गिराने के पिछे भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना, विश्वहिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं का हाथ बताया गया। इस घटना के बाद देश भर में हिंदू-मुसलमानों के बीच दंगे भड़क गए, जिनमें करीब 2,000 लोग मारे गए। 16 दिसंबर 1992 को मामले की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया।

पहले इस मामले में आडवाणी सहित 49 लोगों के ख़िलाफ़ लखनऊ में मुकदमा चला लेकिन, उच्च न्यायालय ने आठ शीर्ष हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं से संबंधित मामले को अलग कर दिया। बता दें कि आठ नेताओं के मामले की सुनवाई रायबरेली में हो रही है। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, साध्वी रितम्भरा, विष्णु हरि डालमिया, अशोक सिंघल और गिरिराज़ किशोर सहित आठ लोगों के नाम शामिल है।

जुलाई 2009 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी। सरकार बदलती गई और फैसलों पर सुनवाई टलती गई नतीजा ये हुआ कि आज भी अयोध्या विवाद एक विवाद ही बना हुआ है। बहरहाल अयोध्या विवाद को सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने के बाद इस पर गहमागहमी काफी बढ़ गई है और अब ये संभावना जताई जा रही है कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच 2018 की दीवाली से पहले इसपर फ़ैसला सुना सकती है।

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