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अरुणा आसफ़ अली दिल्ली की पहली महापौर

अरुणा आसफ़ अली ने गौलिया टैंक मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराकर भारत छोड़ो आंदोलन के आगाज की सूचना दी।
Mar 26, 2018, 12:35 pm ISTLeadersAazad Staff
Aruna Asaf Ali
  Aruna Asaf Ali

 भारत छोड़ो आंदोलन में मुख्य भूमिका अदा करने वाली अरुणा आसफ़ अली का जन्म 16 जुलाई 1909 को कालका (हरियाणा) के एक रूढ़िवादी हिंदू बंगाली परिवार में हुआ था। इनका बचपना का नाम रुणा गांगुली था।

शिक्षा -
लाहौर और नैनीताल के सेक्रेड हार्ट कान्वेंट से उन्होने अपनी शिक्षा प्राप्त की।
स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद अरुणा आसफ ,गोखले मेमोरियल स्कूल, कलकत्ता, में शिक्षक के तौर पर कार्य करने लगीं।

अरुणा  ने अपने से 23 साल बड़े आसफ अली से अपने परिवार के विरुध जाकर। 1928  में शादी कर ली।

आसफ अली स्वतंत्रता संग्राम से पूरी तरह से जुड़े हुए थे इसीलिये शादी के उपरांत अरुणा आसफ अली भी उनके साथ इस मुहीम में जुड़ गयीं । वर्ष 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान उन्होंने सार्वजनिक सभाओं को सम्बोधित किया और जुलूस निकाला। ब्रिटिश सरकार नेउन पर आवारा होने का आरोप लगाया और उन्हें एक साल जेल की सजा सुनाई। गांधी-इर्विन समझौते के अंतर्गत सभी राजनैतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया, पर अरुणा को मुक्त नहीं किया गया। परन्तु जब उनके पक्ष में एक जन आंदोलन हुआ तब ब्रिटिश सरकार को उन्हें छोड़ना पड़ा।

हालांकि एक साल बाद उन्हे फिर से 1932 में बंदी बना लिया गया और तिहाड़ जेल भेज दिया गया । वहां भी उनका आंदोलन कम होने का नाम नहीं ले रहा था और उन्होने एक बार फिर कैदियों के साथ हो रहे जेल में अत्याचार के विरोध आदोलन झेड़ दिया। उन्होने जेल भी ही भूख हड़ताल की। उनके इस आदोलन को देखते हुए हालात में कुछ सुधार हुआ। लेकिन वह स्वयं अम्बाला के एकांत कारावास में चली गयीं।

वर्ष 1958 में वह दिल्ली की प्रथम महापौर चुनी गईं । राष्ट्र निर्माण में जीवन पर्यन्त योगदान के लिए उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1964 में उन्हें अंतरराष्ट्रीय लेनिन शांति पुरस्कार मिला ।

हालांकि जब वो जेल से रिहा हुई तो उन्हे 10 साल के लिए राष्ट्रीय आंदोलन से अलग कर दिया गया। वर्ष 1942 में उन्होंने अपने पति के साथ बॉम्बे के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया जहाँ पर 8 अगस्त को ऐतिहासिक ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित हुआ।

भारत छोड़ो आंदोलन में इनकी अहम भूमिका रही। हालांकि ब्रिटिश हुकुमत की गिरफ़्तारी से बचने के लिए उन्हे भूमिगत होना पड़ा था। उनकी संपत्ति को सरकार द्वारा जब्त करके बेच दिया गया। सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए 5000 रुपए की घोषणा भी की। इस बीच वह बीमार पड़ गईं और यह सुनकर गांधी जी ने उन्हें समर्पण करने की सलाहदी। 26 जनवरी 1946 में जब उन्हें गिरफ्तार करने का वारंट रद्द किया गया तब अरुणा आसफ अली ने स्वयं आत्मसमर्पण किया।

अरुणा आसफ़ अली इन पुरस्कारों से किया गया था सम्मानित-

1975 में उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार और 1991 में अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान के लिए जवाहर लाल नेहरू पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। 29 जुलाई 1996 को अरुणा आसफ अली का देहांत हो गया।

अरुणा आसफ़ अली की याद में उन्हे 1998 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ और भारतीय डाक सेवा द्वारा जारी किए गए एक डाक टिकट से सम्मानित किया गया।

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