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Prem Chandra Ke Fatay Jhootay (प्रेम चन्द्र के फटे जूते)

Wednesday, Jun 10, 2026 | Last Update : 05:44 AM IST

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Prem Chandra Ke Fatay Jhootay (प्रेम चन्द्र के फटे जूते)

Prem Chandra Ke Fatay Jhootay (प्रेम चन्द्र के फटे जूते)
Jun 14, 2011, 11:14 am ISTInspirational StoriesSarita Pant
Prem Chandra Ke Fatay Jhootay
  Prem Chandra Ke Fatay Jhootay

प्रेम चन्द्र के फटे जूते

प्रेमचंद्र हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक हुए है | इतने बड़े लेखक होते हुए भी प्रेम चन्द्र का जीवन अभावो से भरा हुआ था | लिखने में इतनी आमदनी नहीं थी की ढंग से गुज़र बसर हो सके | उनका जीवन सादगी का नमूना था | ऐसे प्रेमचंद्र का कोई एक फोटो चित्र  लेखक के व्यंग का विषय है जिसमें प्रेमचंद्र  फटे जूतें पहेने  हुए है | उनके फटे जूतों  के बहाने लेखक ने समाज की अनेक विशेषताओ और बुराइयों पर तीखा प्रहार किया है | लेखक प्रेमचंद्र जी का चित्र देखते हुए कहेते है क़ि उन्होंने मोटे कपडे की टोपी, कुरता और धोती पहनी हुई है | कनपट्टी दबी हुई और गालो क़ि हड्डिय उभरी हुई थी |

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पेरो में कैनवास के जूतें है जिनमें एक से जूता आगे से फटा हुआ है | छेद से ऊँगली बाहर निकली हुई थी | लेखक मनन करता है क़ि फोटो के लिये ऐसे पोशाक है तो पहनते कैसे होंगे लेकिन वोह असलीयत में जेसे है वैसे ही फोटो में है | वे प्रेमचंद्र के चहरे को देख कर पूछते है क़ि उन्हें फटे जूतें का पता है | क्या उन्हे लज्जा या संकोच होती ? किन्तु उनके चहरे पर बेपरवाही और विश्वाश है फोटो खिचते समय जब उन्हें तैयार होने के लिये काहा गया होगा तोह उन्होंने मुस्कराने की कोशिश की होगी किन्तु अभी मुस्कान ऊपर की ओर आ रही थी क़ि फोटो खीच दी उनकी इस अधुरी मुस्कान से उपहास झलकता है |

लेखक आश्चर्य से पूछता है कि प्रेमचंद्र जी फटे जूतें पहन कर फोटो खिचा रहे है और किसी पर हस भी रहे है | यदि उन्हें फोटो खीचना ही था तो जूतें तो अच्छे पहन लेते शायद पत्नी के कहने पर फोटो खिचवा रहे होंगे | लेखक उनकी फोटो के माध्यम से उनके दुःख को महसूस करके रोना चाहता है लेकिन उनकी आखों  का दर्द उन्हें ऐसा करने से रोक देता है | यदि वे फोटो का महत्त्व समझते तो जूतें मांग लेते |

लैखेक यहाँ कहना चाहता है कि उन्होने समाज मई फैली बुरइयो को अपनी ठोकर साईं हटाने का प्रयास किया होगा रास्ते कि अडचनों को उन्होने जूते कि ठोकर से हटाना चाह होगा | लैखेक ये समझ गया कि प्रेमचंद्र जी समाज मई व्यापत भेदभाव और को देखकर मुस्करा रहे है वे अवसरवादी और स्वार्थपरक लोगो पैर व्यंग केर रहे है | जो वास्तविकता को छिपाते है संघर्षों से बचकर निकलती है उन पर हस रहे है | लेखक यही कहता है कि वे उनके दवारा दिये गयी निर्देशो को भली भाती समझ गयी है |

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